विजया एकादशी व्रत कल, नोट कर लें पूजा विधि, पारण टाइम, नियम
संक्षेप: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व होता लेकिन फाल्गुन माह में पड़ने वाली विजया एकादशी का महत्व काफी खास और अलग माना जाता है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, “विजया” यानी जीत। यह जीत बाहर की दुनिया से ज्यादा अपने मन, डर, अहंकार और नकारात्मक सोच पर होती है।
Vijaya Ekadashi Vrat 2026: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व होता लेकिन फाल्गुन माह में पड़ने वाली विजया एकादशी का महत्व काफी खास और अलग माना जाता है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, “विजया” यानी जीत। यह जीत बाहर की दुनिया से ज्यादा अपने मन, डर, अहंकार और नकारात्मक सोच पर होती है। यह एकादशी फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में आती है, इसलिए इसे फाल्गुन कृष्ण एकादशी भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से भगवान श्रीकृष्ण या विष्णु की पूजा करने और व्रत रखने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और मन को शांति मिलती है। हिंदू पंचांग के अनुसार, विजया एकादशी 2026 शुक्रवार, 13 फरवरी को मनाई जाएगी।
मुहूर्त-
एकादशी तिथि प्रारंभ: 12 फरवरी दोपहर 12:22 बजे
एकादशी तिथि समाप्त: 13 फरवरी दोपहर 2:25 बजे
पारण (व्रत खोलने का समय): 14 फरवरी सुबह 7:00 बजे से 9:14 बजे तक
क्यों खास है विजया एकादशी?- विजया एकादशी हमें यह सिखाती है कि सच्ची सफलता धन या भौतिक चीजों से नहीं, बल्कि आंतरिक शांति और श्रद्धा से मिलती है। जब इंसान अपने मन को भगवान के चरणों में समर्पित करता है, तो डर और असमंजस अपने आप दूर हो जाते हैं। यह व्रत धैर्य, विश्वास और संयम की सीख देता है। कठिन समय में भी उम्मीद बनाए रखने की प्रेरणा देता है। इसी वजह से इसे “जीत दिलाने वाली एकादशी” भी कहा जाता है।
व्रत के नियम-
विजया एकादशी का व्रत शरीर और मन दोनों को शुद्ध करने का तरीका है।
अनाज और भारी भोजन से परहेज करें।
फल, दूध या हल्का सात्विक भोजन लें।
कुछ भक्त निर्जला व्रत भी रखते हैं।
दिनभर मन को शांत रखें।
गुस्सा, झूठ और बुरी आदतों से दूरी रखें।
व्रत का असली मकसद खुद पर नियंत्रण और भक्ति में ध्यान लगाना है।
पूजा विधि- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ-सुथरे कपड़े पहनें। घर के मंदिर या किसी शांत जगह पर भगवान की मूर्ति या तस्वीर के सामने दीपक जलाएं और मन में व्रत का संकल्प लें कि आज का दिन भक्ति और संयम के साथ बिताएंगे। पूजा के दौरान भगवान को फूल, तुलसी के पत्ते, फल और सात्विक भोग अर्पित करें। शांत मन से उनका ध्यान करें और मंत्र जप करें। आप “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या हरे कृष्ण महामंत्र का जप कर सकते हैं। अगर समय मिले तो गीता या विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी कर सकते हैं। दिनभर कोशिश करें कि मन भगवान के नाम में लगा रहे और घर का माहौल सकारात्मक बना रहे। भजन, कीर्तन, मंत्र जप और सेवा में समय बिताएं।
दान करें- जरूरतमंद लोगों की मदद करें या दान दें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी के दिन किया गया दान कई गुना फल देता है और मन को सच्ची शांति मिलती है। खासकर अन्नदान बहुत पुण्यदायक माना जाता है।
एकादशी व्रत का पारण कैसे करें?- धार्मिक ग्रंथों जैसे पद्म पुराण, स्कंद पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में एकादशी व्रत का महत्व बताया गया है। इन ग्रंथों के अनुसार एकादशी का व्रत जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उसका सही समय पर पारण (व्रत खोलना) भी है। अगर पारण सही विधि और समय पर किया जाए तो व्रत का पूरा फल मिलता है। पुराणों में कहा गया है कि एकादशी के अगले दिन, यानी द्वादशी तिथि में ही व्रत का पारण करना चाहिए। द्वादशी तिथि के भीतर पारण करना शुभ माना गया है। अगर द्वादशी समाप्त हो जाए और उसके बाद व्रत खोला जाए, तो व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता। इसलिए पंचांग देखकर सही पारण समय जानना जरूरी होता है।
पारण का सही समय- धार्मिक मान्यता के अनुसार पारण सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि रहते हुए करना चाहिए। ब्रह्म मुहूर्त के बाद स्नान करें, भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की पूजा करें और उन्हें भोग अर्पित करें। उसके बाद ही स्वयं भोजन ग्रहण करें। अगर द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाए, तो विशेष नियम लागू होते हैं, इसलिए ऐसे में स्थानीय पंचांग या जानकार आचार्य से जानकारी लेना बेहतर माना गया है।
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पारण की विधि- सुबह स्नान करके साफ वस्त्र पहनें। भगवान विष्णु के सामने दीपक जलाएं और प्रार्थना करें। तुलसी दल और फल अर्पित करें। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें। भगवान को सात्विक भोजन का भोग लगाएं। पारण से पहले ब्राह्मण, गौ या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन या दान देना शुभ माना गया है। इसके बाद स्वयं सात्विक भोजन से व्रत खोलें। पारण में सबसे पहले जल या तुलसी मिला जल ग्रहण करना अच्छा माना जाता है। कई परंपराओं में फल या हल्का भोजन लेकर पारण किया जाता है।
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किन बातों का ध्यान रखें?- पुराणों में कहा गया है कि द्वादशी के दिन भी सात्विक आहार ही लें। पारण के तुरंत बाद भारी या तामसिक भोजन न करें। गुस्सा, झूठ और नकारात्मक व्यवहार से दूर रहें।
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य है और सटीक है। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।
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